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मृगतृष्णा

सरकारी नौकरी लगते ही रिश्तेवालों की सूची लम्बी हो गई थी. हर दिन एक नए रिश्ते लेकर कोई न कोई उसका घर चला आता था. अपनी मां से जब भी उसकी बातें होती वह लड़की के दादा परदादा से लेकर उसकी जनम कुण्डली तक बखान कर ही दम लेती. हर दिन रिश्ते के नए चेप्टर खुलते, उसके मन में इस बात को लेकर कुतूहल बना रहता था. उसे स्कूल के दिन याद हो आए थे. वहां भी हर रोज नए चेप्टर खुलते और नई-नई जानकारी मिलती थी. बात कुछ वैसी ही यहां पर भी उसके साथ हो रही थी. यहां भी हर रोज रिश्ते के चेप्टर खुलते थे और नई-नई लड़कियों की जानकारी मिलती थी. यहां के चेप्टर भले ही अलग होते, किंतु मूल बिन्दु तो एक ही थी, शादी. आखिर ये सब सुनते-सुनते गजेन्द्र का मन भी भर गया था. एक दिन उसने मां से कहा – मां ! शादी के अलावे भी तो कई सारी बातें होगी तेरे पास. तुम मेरी शादी के पीछे क्यों पड़ी हुई हो ?
उसकी मां डपटकर बोली – रेहेन दे, अभी शादी ना करेगा तो क्या अच्छी छोरियां हाथ में आरती की थाली सजाए तेरी आस में बैठी रहेगी ? आजकल अच्छी छोरियां मिलती कहां है ? तेरा भाग्य उजला है कि मनमोहनी - सी छोरियों के बाप तेरे आने के वाट जोह रहे हैं. सुन, अबकीबार जब अईयो, लड़की फाइनल करके ही जाना. हम बार - बार कुटुम्बों को अंधेर में नहीं रखसकते हैऔर हां खाना पीना ढंग से करना, पिछली बार जब तू आया था बहुत दुबला गया था. रखती हूं, घर में ढ़ेरों काम पड़ा हुआ है.                          
मां ने फोन रख दिया था, किंतु उनकी बातों पर ही गजेन्द्र का मन अबतक उलझा हुआ था. शादी .......शादी.......शादी........खुद को वह शादी के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं कर पा रहा था. अभी उसकी नौकरी लगे साल भर भी नहीं हुआ था, और उसके घरवाले उसकी शादी के लिए परेशान हो रहे थे. पहला प्रोमोशन के बाद ही इसपर विचार करने के बारे में वह सोच रहा था किंतु, घरवालों की जिद्द के आगे उसकी एक भी नहीं चल रही थी.
इस बार घर आते ही उसकी खातिरदारी राजकुमारों - सी होने लगी थी. खान पान से लेकर बिछावन तक उसकी पसन्द का खास ख्याल रखा जा रहा था. बेटा चाहे कितने भी नालायक क्यों न हो लेकिन, शादी विवाह के समय आते ही उसकी खातिरदारी ऐसी होने लगती है, जैसे वह विश्व विजेता बनकर लौटे हो. पर यहां तो गजेन्द्र की बात ही कुछ जुदा थी. वह नालायक नहीं, बल्कि अपने खानदान का नाम रौशन करने वाला एक महत्वाकांक्षी युवक था. उसकी खातिरदारी राजकुमारों-सा होना तो बनता था.
सर्दियों का मौसम था. बाहर बगीचे में सुनहरी धूप आ गई थी. इस खिली-खिली सुबह को देखकर उसका मन भी खिल उठा था. अखबार उठाकर वह सीधे बगीचे में चला गया. बाहर की ठंडी हवा और खिली धूप का सम्मिश्रण पाकर उसका मन पुलकित हो रहा था. उसी समय अपने हाथ में कुछ तस्वीरें लिए उसकी मां वहां आ पहुंची. बेटे के हाथ में उन तस्वीरों को थमाकर उसकी मां वहीं सामने बैठ गई और बोली – अब तू खुद ही देख ले और अपना मनपसंद जीवनसाथी चुन ले. बाद में कोई गिला-शिकवा ना रहे मन में.
मां आप भी ना कमाल करती हो. फुरसत से देख लेते इतनी हड़बड़ी किस बात की ? – गजेन्द्र जरा झल्ला उठा.
तू ना समझेगा, शुभ काम में देरी किस बात की. – मां ने समझाना चाहा.
उसके हाथ में कई लड़कियों की तस्वीरें थी. साथ में उनके बायोडाटा भी लगे हुए थे. एक-एक कर वह तस्वीर देखता गया. फाइनली एक तस्वीर पर आकर नज़र अटकी – सोनम प्रकाश, एजुकेशन – एमबीए मार्केटिंग़. उसके बारे में सारा डिटेल्स लिया. वह अपनी ही बिरादरी की निकली. उसके पूर्वज पास के ही गांव के मूलवासी थे किंतु, नौकरी के बाद उनके दादा चण्डीगढ़ में जा बसे थे. उसके बाद उनका परिवार वहीं का होकर रह गया. सबकुछ मैचिंग में ही लगा. एक शुभ दिन देखकर वे लोग लड़की वाले के यहां पहुंच गए. लड़की तस्वीर से भी कई ज्यादा सुन्दर निकली. बात आगे बढ़ी और शादी तय हो गयी. चट मंगनी पट विवाह संपन्न हो गया.
नवविवाहित जोड़े सारे रस्मों को निपटाने के बाद बेंगलोर चले आए. गजेन्द्र वहीं नौकरी करता था. सोनम अपने शहर से काफी दूर आ गई थी. उसके लिए यह पहला मौका था जब उसे अपने घरवालों से इतना दूर रहना पड़ रहा था. अपनों से दूर होने के बाद उसके दिल में जो खाली जगह बन गई थी उसे अभी तक गजेन्द्र भर भी नहीं पाया था. गजेन्द्र स्वभावतः एक सुलझे हुए, माहिर एवं चिंतनशील युवक था. ऑफिस में अत्यधिक कार्य दवाब के बावजूद भी वह घर पर सोनम को इसका लेशमात्र भी भनक नहीं होने देता और बड़ी एनेर्जेटिकली उसके साथ घुमता-फिरता और मौज-मस्ती करता था. उसे हर वक्त खुश रखने के लिए नित-नए सरप्राइज पेश करता. नई-नई जगह घुमना-फिरना, अच्छे-अच्छे रेस्टोरेंट में सरप्राइज पार्टी रखना, छोटे-छोटे अवसरों को भी बड़े मनोरंजक ढंग से सेलिब्रेट करना और उसके मनचाहे गिफ्ट लाकर देना आदि मानो गजेन्द्र के लाईफस्टाइल में अहम रूप से शामिल हो गया था. इन सबके पीछे एक ही मंशा था – सोनम को सर्वाधिक खुशहाल रखना.
समय बीतता गया. सोनम भी पढ़ी-लिखी थी. घर पर यूं ही खाली बैठे रहना उसे अच्छा नहीं लगता. बेंगलोर जैसे शहरों में तो अवसर की कोई कभी भी नहीं थी. उसने भी जॉब कर ली. अब उसे भी अकेलापन महसूस नहीं होता. घर की आमदनी भी दुगुनी हो गई थी. गजेन्द्र को भी थोड़ी राहत मिली और काम करने से सोनम का भी मन लगा रहता था. साथ ही, धीरे-धीरे उसमें आत्मनिर्भरता की भावना भी आने लगी थी. यह उसके लिए अच्छी बात थी.
थैंक यू....यू....यू....यू ! – सोनम ने भी बड़ी प्यारी सी मुस्कान के साथ ‘यू’ को गीतलहरियों में पिरोकर उसका शुक्रिया अदा किया.
आज सचमुच वह बहुत ही खूबसूरत लग रही थी. वैसे वह बेशक खूबसूरत थी, पर आज उसके लिए खास दिन था इसीलिए कुछ ज्यादा ही सज-संवर कर ऑफिस आई थी. आज उनका फस्ट मैरिज एनिवर्सरी था. हाफ़ डे के लिए ऑफिस आई थी. ऑफिस में यह खबर फैलते ही सभी ने आकर उसे बधाई दी. खुद बॉस भी उसके पास आकर बोले – सोनम जी ! कंग्रेचुलेशन्स ऑन योर फस्ट मैरिज एनिवर्सरी. और यह हमारे ऑफिस की ओर से छोटी सी भेंट. कहकर उन्होनें गिफ्ट का एक पैकेट उसे थमा दिया.
सोनम घर तो आ गई थी किंतु, उसका मन अभी भी ऑफिस में ही चौकड़िया भर रहा था. अपनी सुंदरता को लेकर ऑफिस में मिले कम्प्लिमेंट से वह फूले नहीं समा रही थी. वह जानती थी कि वह खूबसूरत है किंतु, इतनी ज्यादा खूबसूरत है इस बात का अहसास उसे आज पहली बार हुआ था. उसमें भी बंटी के शब्दों ने तो मानो उसे किसी सेलेब्रिटी के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया हो. ब्युटीक्वीन, टेलेंटेड वाह ! वाह ! क्या बात कही थी उसने. आजतक गजेन्द्र ने भी उसकी तारीफ़ में ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया था या कभी किया भी होगा तो उसे नोटिस नहीं किया गया था. इसमें सच्चाई भी है, अगर पति तारीफ़ में अच्छे शब्दों का प्रयोग करे तो पत्नियों का ध्यान उसके शब्दों की ओर नहीं जाकर शब्दों के पिछे के कारणों की ओर चला जाता है कि आखिर आज जरूर कुछ बात है, इसीलिए खुशामद कर रहे हैं. पति द्वारा की गई तारीफ पत्नियों की नज़र में खुशामद बन जाती है, इसीलिए सही जजमेंट नहीं हो पाता.
शाम को घर आते ही सोनम ने ऑफिस की सारी दास्तान गजेन्द्र को सुनाई. उसने सबकुछ सुना किंतु, उतने इंटरेस्ट के साथ नहीं जितना कि सोनम अपेक्षा करती थी. पतियों की भी तो यही मानसिकता होती है कि अपनी पत्नी की तारीफ़ या निंदा का सिर्फ उन्हें ही फण्डामेंटल राइट प्राप्त है. अगर उसकी पत्नी की तारीफ़ या निंदा कोई और करे तो उन्हें लगता कि उनके फण्डामेंटल राइट का किसी ने अतिक्रमन कर लिया हो. कुछ ऐसा ही अनुभव गजेन्द्र को भी हुआ था. इसीलिए उसने भी टॉपिक को बदलते करते हुए कहा – अच्छा छोड़ो इन बातों को. आगे का क्या प्लानिंग है ?
सोनम ने कहा - चलते हैं किसी रेस्टोरेंट में.
ओ.के.
दोनों रेस्टोरेंट चल दिए.

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