Skip to main content

वर्ष 2017 फ्लैश बैक


समय एक बहती हुई नदी की धारा के समान है। यह सिर्फ आगे बढ़ना जानता है, पीछे मुड़कर देखना इसकी फितरत में नहीं है। हममें से कई लोग समय - वेग के साथ आगे बढ़ना सीख लेते हैं और अपने जीवन में नित नई बुलंदियों को छूते जाते हैं, मगर कुछ लोग समय के पीछे पीछे उसका अनुकरण करते हुए चलते हैं और जीवन में सीमित सफलता ही प्राप्त कर पाते हैं, जबकि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जाने अनजाने में समय की चाल के विपरीत चलने लगते हैं और अपने जीवन में असफलता, निराशा, कुंठा और हताशा का ही वरन करते हैं। तो यह पूरी तरह आप पर निर्भर करता है की समय की चाल को आप किस तरह ग्रहण करते हैं। इसकी निरंतर आगे बढ़ती हुई चाल में आप कदम से कदम मिलाकर चल पाते हैं अथवा नहीं।

मैं समय का सच्चा पारखी होने का दावा तो नहीं कर सकता हूँ परंतु समय की चाल के साथ पूरी तरह कदमताल करने का प्रयास अवश्य करता हूँ। इस क्रम में कभी सफल होता हूँ तो कभी असफल, मगर हार नहीं मानता क्योंकी जिस प्रकार पीछे मुड़कर देखना समय की फितरत में नहीं है उसी प्रकार हार मानना मेरी फितरत में नहीं हैं।

अगर मैं 2017 पर सरसराती नजर डालकर आपको बताऊँ तो यह वर्ष मेरे लिए बहुत ही अच्छा रहा, किन्तु महात्वाकांक्षी और स्वप्नदर्शी होने के नाते मैं महसूस करता हूँ कि इसे और बेहतर बनाया जा सकता था। किन्तु कोई गल नहीं, वर्ष 2018 अपने स्वर्णिम झरोखों से झाँकने लगा है और अपनी रही सही महात्वाकांक्षाएँ आगामी वर्ष में अवश्य पूरा करूंगा।
संक्षिप्त में एक नजर डालते हैं वर्ष 2017 पर
नव वर्ष की शुरुआत अपनी कार्यालयी जिम्मेदारियों की वजह से अत्यंत व्यस्तता के साथ हुई। माननीय हुक्मदेव नारायण यादव, लोक सभा सदस्य एवं पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री की अध्यक्षता वाली संसदीय राजभाषा समिति का सामना 05 जनवरी को त्रिवेन्द्रम, केरल में करना पड़ा, जिसमें जयप्रकाश नारायण यादव सहित कुल पाँच सांसद उपस्थित थे ।
  संसदीय समिति की झलकियाँ 





साथ ही, इसी माह में लेखन के क्षेत्र में भी मेरी एक बड़ी उपलब्धि रही। अलबेलिया नाम से मेरा एक कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ और इसने मुझे लेखन के क्षेत्र में एक नई पहचान दी। Amazon,Flip cart जैसे ऑनलाइन मार्केट पर भी मेरी यह पुस्तक उपलब्ध है और खुशी की बात यह है कि इसी वर्ष अगस्त तक इसका फ़स्ट एडिशन समाप्त हो गया। 






फरवरी माह में काफी यात्राएं की। अपने माता-पिता एवं पत्नी के साथ कन्याकुमारी, रामेश्वरम तथा मदुरै के मीनाक्षी मंदिर के दर्शन किए।

इसी माह में माह में महाबलीपुरम जाकर दोस्तों के साथ मौज-मस्तियाँ भी खूब की ।



मार्च में स्वर्ण मंदिर, अमृतसर के द्वारे माथा टेकने का सौभाग्य मिला, अत्यंत सुखद अनुभूति रही। 

वाघा बॉर्डर में हमारे जांबाज सैनिकों की बिटिंग रिट्रीट व पेरेड कार्यक्रम को देखने व सैनिकों के जोश जब्बे को अनुभूति करने का अवसर मिला। 



कुछ छुट्टियों का पल केरल में बिताया । इस दौरान मुनार के चाय बागान में अठखेलियाँ करते हुए। 


मुनार के जंगलों में गज की सवारी का लुत्फ उठाते हुए। 



कार्यालयी उपलब्धियां 


मुंबई में देश के विभिन्न कोनों से आए हुए मित्रों, मार्गदर्शकों व शुभचिंतकों के साथ । 


केंद्रीय गृह राज्य मंत्री माननीय श्री किरेन रिजिजू जी के हाथों सम्मान प्राप्त करते हुए। 


आगामी पोस्ट वर्ष 2018 का संकल्प शीघ्र ही पोस्ट करूंगा । 

Comments

Popular posts from this blog

अपना फ़र्ज

अपना फ़र्ज &&& @@@@ वसंत कुंज सोसाइटी में कृष्णजन्माष्टमी के अवसर पर एक भव्य सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया था। जिसमें मशहूर गायक अभिनव चंचल आ रहे थे। हर जगह उनका पोस्टर लगा दिया गया था। अभिनव चंचल गायन के क्षेत्र में एक नामी गरामी हस्ती माना जाता है। भक्ति संगीत के साथ साथ उन्होंने बॉलीवुड के कई प्रसिद्ध फिल्मी गानों में भी अपना स्वर दे चुका है। एक ओर युवावर्ग उनके फिल्मी गानों के मुरीद हैं तो वहीं दूसरी ओर उनके धार्मिक गीतों और भजनों ने वैसे लोगों को मंत्र – मुग्ध कर रखा है , जो जरा आध्यात्मिक किस्म के हैं। इसमें बच्चे से लेकर वृद्ध वर्ग तक के लोग शामिल हैं ।  रत्नावली आज तड़के सुबह उठ गई और नहा धोकर पूजा में बैठ गई । दामोदर प्रसाद को भी नींद नहीं आ रही थी किंतु, फिर भी बिस्तर पकड़े हुए थे । दो-चार दिनों से उनके घुटनों का दर्द जरा बढ़-सा गया था, और अन्दर ही अन्दर हल्की कंपकपी का अनुभव हो रहा था । थोड़ा चल फिर लेता तो सांस फूलने लगती । इसकी वजह कोई खास बीमारी तो नहीं थी किंतु, सबसे बड़ी बीमारी उसका बुढ़ापा था । दामोदर प्रसाद बहत्तर साल के हो चुके हैं, ज...

मृगतृष्णा

सरकारी नौकरी लगते ही रिश्तेवालों की सूची लम्बी हो गई थी. हर दिन एक नए रिश्ते लेकर कोई न कोई उसका घर चला आता था. अपनी मां से जब भी उसकी बातें होती वह लड़की के दादा परदादा से लेकर उसकी जनम कुण्डली तक बखान कर ही दम लेती. हर दिन रिश्ते के नए चेप्टर खुलते, उसके मन में इस बात को लेकर कुतूहल बना रहता था. उसे स्कूल के दिन याद हो आए थे. वहां भी हर रोज नए चेप्टर खुलते और नई-नई जानकारी मिलती थी. बात कुछ वैसी ही यहां पर भी उसके साथ हो रही थी. यहां भी हर रोज रिश्ते के चेप्टर खुलते थे और नई-नई लड़कियों की जानकारी मिलती थी. यहां के चेप्टर भले ही अलग होते, किंतु मूल बिन्दु तो एक ही थी, शादी. आखिर ये सब सुनते-सुनते गजेन्द्र का मन भी भर गया था. एक दिन उसने मां से कहा – मां ! शादी के अलावे भी तो कई सारी बातें होगी तेरे पास. तुम मेरी शादी के पीछे क्यों पड़ी हुई हो ? उसकी मां डपटकर बोली – रेहेन दे, अभी शादी ना करेगा तो क्या अच्छी छोरियां हाथ में आरती की थाली सजाए तेरी आस में बैठी रहेगी ? आजकल अच्छी छोरियां मिलती कहां है ? तेरा भाग्य उजला है कि मनमोहनी - सी छोरियों के बाप तेरे आने के वाट जोह रहे हैं. सुन, ...

लखिया

लखिया रामनारायण पाठक की पुत्री थी. रामनारायण पाठक पेशेवर शिक्षक थे, पर लक्ष्मी की उसपर विशेष कृपा नहीं थी. परिवार के भरण-पोषण के बाद वे बमुश्किल ही कुछ जोड़ पाते थे. उसकी आमदनी तो वैसे दस हजार मासिक थी, लेकिन खर्च भी कम कहां था ? हाथ छोटा कर वह जो भी जोड़ता पत्नी की दवा-दारू में सब हवन हो जाता था. उसका परिवार बहुत बड़ा नहीं था. वे लोग गिने-चुने चार सदस्य थे – दो लड़कियां और अपने दो. बड़ी लड़की लखिया आठ वर्ष की थी और छोटी मित्रा पांच की. उसकी पत्नी भगवती खूब धरम-करम करती किंतु, अपने पेट की पीड़ा से वह पिछा नहीं छुड़ा पाती थी. पाठक जी ने उसके पेट की पीड़ा के लिए क्या नहीं किया, कई शहरों के नामी-गरामी डॉक्टरों से इलाज करवाए, लेकिन आजकल की बीमारियों पर तो आग लगे छुटने के नाम ही नहीं लेती ? एक दिन अचानक रामनारायण पाठक दुनिया दारी से मुक्त होकर चिरस्थायी निद्रा में लीन हो गए. भगवती की दशा अब आगे नाथ न पिछे पगहा वाली हो गई थी. घर के मुखिया का इस तरह अचानक चल बसना अच्छे -अच्छों को भी तोड़ कर रख देता है और भगवती तो ठहरी सदा पेट की बीमारी से परेशान रहने वाली एक मरीज. अब उसे जीने की कोई इच्छा नहीं थ...