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मन बार-बार रोता रहा

मन बार-बार रोता रहा जीने की सूध हर बार खोता रहा, नयन तो टिकी थी, उसके आने की राह में पर क्या पता,  उस राह में कोई नफ़रत के कांटे बोता रहा. मानता हूं, एक खता तो हुई थी मुझसे भी, ए जिन्दगी, किसी के सपने जुड़े थे मुझसे भी, ए जिन्दगी, पर क्या पता, पल भर में वह रूठ जाएगी मुझसे भी, ए जिन्दगी. राह जिन्दगी का यूं बदल लेगी मुझसे भी, ए जिन्दगी. तड़पकर उसकी याद में, तलब से मगर, हर बार यादों के दीये जलाता रहा और दिल को रुलाता रहा, मन को समझाता रहा.

चिड़िया

चिड़िया रानी चिड़िया रानी मुझे तू लगती बड़ी सुहानी पेड़ों पर खूब मजे से रहती है सुन्दर सुन्दर घोंसला बनाती है गगन में पंख फैलाकर उड़ती है थककर पेड़ों पर आ बैठती है नानी सुनाती तेरी सुन्दर कहानी चिड़िया रानी चिड़िया रानी मुझे तू लगती बड़ी सुहानी             दिनभर दाना चुन चुन लाती है             नन्हें नन्हें बच्चों को खिलाती है             जाड़े हो या गर्मी खुले बदन सहती है             बरसात से भी नहीं कभी घबराती है             दुनिया में चलती खूब तेरी मनमानी              चिड़िया रानी चिड़िया रानी मुझे तू लगती बड़ी सुहानी

एक अजनवी

एक अजनवी वीरान इस शहर में  पल दो पल जी लेने का बहाना ढूँढता है,  तन्हाइयों का आलम छंट जाए दिल से जरा,  इसलिए हर सूरत में दोस्ती का खजाना ढूंढता है.  यादों के झरोखों से झांककर देखा, गांवों की गलियों में गुज़री अतीत की रेखा,  बहुमंजिली इमारत के बंद कमरे में बैठा  आज भी वही पूराना घर का अंगना ढूंढता है.  एक अजनवी वीरान इस शहर में   पल दो पल जी लेने का बहाना ढूँढता है,  वक्त की नज़ाकत को परख इस कदर बड़े हुए, किसी ने गले लगाया कोई था झुकाने को अड़े हुए,  भुला गिले शिकवे अब शब्दों का एक प्यारा संसार रचें,  इसलिए कमरे के सूनेपन में भी कोई अफ़साना ढूंढता है. एक अजनवी वीरान इस शहर में, पल दो पल जी लेने का बहाना ढूँढता है,

उम्मीदों की कश्ती में

टिमटिमाते तारे की रोशनी में मैंने भी एक सपना देखा है   ।    टुटे हुए तारे को गिरते देखकर मैंने भी एक सपना देखा है   ।    सोचता हूं मन ही मन कभी काश ! कोई ऐसा रंग होता जिसे तन-बदन   में लगाकर सपनों   के रंग में रंग जाता । बाहरी   रंग के संसर्ग पाकर मन   भी वैसा रंगीन हो जाता । सपनों   से जुड़ी है उम्मीदें ,  पर     उम्मीदों की उस परिधि को क्या नाम दूं  ?  सोचता हूं तो   मन किसी अनजान भंवर में दीर्घकाल तक उलझ जाता है। कोई अनसोची जवाब उभरता फिर क्षण भर में लुप्त हो जाता है ।    उम्मीद ही तो वह   संजीवनी   है जिसके सहारे सपनों की राह में आने वाली   हर   चुनौतियों के आगे ना कभी   मस्तक झुका ना दिल हारा   ।    उम्मीदों की इसी   कश्ती   में   होकर सवार मैं   सपनों की रंगीन   दुनिया   ढूंढ   निकालूँगा ।