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अपना फ़र्ज

अपना फ़र्ज &&& @@@@ वसंत कुंज सोसाइटी में कृष्णजन्माष्टमी के अवसर पर एक भव्य सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया था। जिसमें मशहूर गायक अभिनव चंचल आ रहे थे। हर जगह उनका पोस्टर लगा दिया गया था। अभिनव चंचल गायन के क्षेत्र में एक नामी गरामी हस्ती माना जाता है। भक्ति संगीत के साथ साथ उन्होंने बॉलीवुड के कई प्रसिद्ध फिल्मी गानों में भी अपना स्वर दे चुका है। एक ओर युवावर्ग उनके फिल्मी गानों के मुरीद हैं तो वहीं दूसरी ओर उनके धार्मिक गीतों और भजनों ने वैसे लोगों को मंत्र – मुग्ध कर रखा है , जो जरा आध्यात्मिक किस्म के हैं। इसमें बच्चे से लेकर वृद्ध वर्ग तक के लोग शामिल हैं ।  रत्नावली आज तड़के सुबह उठ गई और नहा धोकर पूजा में बैठ गई । दामोदर प्रसाद को भी नींद नहीं आ रही थी किंतु, फिर भी बिस्तर पकड़े हुए थे । दो-चार दिनों से उनके घुटनों का दर्द जरा बढ़-सा गया था, और अन्दर ही अन्दर हल्की कंपकपी का अनुभव हो रहा था । थोड़ा चल फिर लेता तो सांस फूलने लगती । इसकी वजह कोई खास बीमारी तो नहीं थी किंतु, सबसे बड़ी बीमारी उसका बुढ़ापा था । दामोदर प्रसाद बहत्तर साल के हो चुके हैं, ज...

कुछ यूँ ही

दुनिया में एक  घटना  अजीब की होती है जो वर्षों बीत जाने पर भी हमारी यादों की पटरी  से नहीं उतरती. दिन, महीने  कई  वर्ष गुजर जाने पर भी वह दिल के सबसे सुरक्षित भाग में संजीवनी  बूटी की तरह सदैव अपनी चिरकालीन हरियाली के साथ लहलहाती रहती है। वह घटना केवल हमारे और आपके साथ ही घटित नहीं होती बल्कि यह घटना तो हर किसी के साथ घटित होती है। कोई उसे सँजोकर अपने दिल की विरासत बना लेते हैं तो कोई उसे भूल जाने का भरपूर स्वांग रचते हैं ,  पर दिल की बात तो दिल ही जाने। मेरे साथ यह घटना उस वक्त घटी थी जब मैं 12वीं में पढ़ता था। उस वक्त तक मैं पूर्ण अक्षत था। अक्षत शब्द का दायरा बहुत बड़ा है इसीलिए इस शब्द का प्रयोग मैं यहाँ अपनी मानसिक अवस्था के संदर्भ में कर रहा हूँ। आप इसका गलत अर्थ मत लगा लेना। इस घटना को मैं अजीब इसीलिए भी कहता हूँ क्योंकि यह बिना तैयारी की अचानक घट जाती है और चिरंजीवी बनकर हमारे दिल के एक भाग को हमेशा हमेशा के लिए रिजर्व कर लेती है. उस दिन मेरे दोस्त कृष्णा के बड़े भाई के तिलक की रस्म थी । दोस्त का घर मेरे पड़ोस में ही था। मैं नियत समय पर शाम क...

एक अजनवी

एक अजनवी वीरान इस शहर में  पल दो पल जी लेने का बहाना ढूँढता है,  तन्हाइयों का आलम छंट जाए दिल से जरा,  इसलिए हर सूरत में दोस्ती का खजाना ढूंढता है.  यादों के झरोखों से झांककर देखा, गांवों की गलियों में गुज़री अतीत की रेखा,  बहुमंजिली इमारत के बंद कमरे में बैठा  आज भी वही पूराना घर का अंगना ढूंढता है.  एक अजनवी वीरान इस शहर में   पल दो पल जी लेने का बहाना ढूँढता है,  वक्त की नज़ाकत को परख इस कदर बड़े हुए, किसी ने गले लगाया कोई था झुकाने को अड़े हुए,  भुला गिले शिकवे अब शब्दों का एक प्यारा संसार रचें,  इसलिए कमरे के सूनेपन में भी कोई अफ़साना ढूंढता है. एक अजनवी वीरान इस शहर में, पल दो पल जी लेने का बहाना ढूँढता है,